मनरेगा के 18 लाख पर बड़ा सवाल: बड़ौदकला में निर्माणाधीन चेकडेम पर अनियमितताओं के आरोप, जांच तक भुगतान रोकने की मांग
कवर्धा। ग्राम पंचायत बड़ौदकला, जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा अंतर्गत गंदुक पाली के खेत के पास निर्माणाधीन चेकडेम कार्य अब विवादों के घेरे में है। लगभग 18 लाख रुपये की लागत से स्वीकृत यह कार्य महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत किया जा रहा है। ग्रामीणों ने इस निर्माण में स्थल चयन से लेकर क्रियान्वयन तक गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं और तत्काल उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
स्थानीय किसानों का कहना है कि जिस स्थान पर चेकडेम बनाया जा रहा है, वह तकनीकी दृष्टि से उपयुक्त नहीं है। आरोप है कि यहां जलग्रहण क्षेत्र का समुचित सर्वेक्षण नहीं किया गया और न ही यह स्पष्ट किया गया कि इस संरचना से किन-किन खेतों को सिंचाई लाभ मिलेगा। ग्रामीणों का दावा है कि इस निर्माण से एक भी किसान को वास्तविक सिंचाई सुविधा नहीं मिलेगी। यदि ऐसा है, तो 18 लाख रुपये की यह परियोजना सरकारी धन के दुरुपयोग का उदाहरण बन सकती है।
मनरेगा के तहत जल संरक्षण और संवर्धन कार्यों में स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं। कार्य प्रारंभ से पहले तकनीकी स्वीकृति, ड्रॉइंग-डिजाइन, अनुमानित लागत, लाभान्वित क्षेत्र का निर्धारण और ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य मानी जाती है। साथ ही, कार्य का उद्देश्य भूजल स्तर बढ़ाना, सिंचाई क्षेत्र का विस्तार करना और ग्रामीणों को अधिकतम रोजगार उपलब्ध कराना होता है। परंतु आरोप है कि यहां इन मूल उद्देश्यों की अनदेखी की गई है।
सबसे गंभीर आरोप रोजगार को लेकर सामने आया है। बताया जा रहा है कि इस कार्य से लगभग 400 मजदूरों को रोजगार मिलना था, लेकिन मौके पर मशीनों से काम कराया जा रहा है। ग्रामीणों ने मस्टर रोल में फर्जी हाजिरी भरने की आशंका भी जताई है। मनरेगा में मशीनों के उपयोग पर कड़े प्रतिबंध हैं और श्रम आधारित कार्य को प्राथमिकता दी जाती है। यदि मशीनों से काम लेकर मजदूरों के नाम पर भुगतान दर्शाया गया है, तो यह नियमों का खुला उल्लंघन माना जाएगा।
इसके अलावा, कार्य एजेंसी ग्राम पंचायत होने के बावजूद किसी अन्य व्यक्ति या समूह को कार्य सौंपे जाने की चर्चा भी है। मनरेगा में ठेकेदारी प्रणाली प्रतिबंधित है और कार्य पंचायत स्तर पर पारदर्शी तरीके से किया जाना चाहिए। यदि बिना विधिवत प्रक्रिया के कार्य बाहरी हाथों में दिया गया है, तो यह गंभीर प्रशासनिक लापरवाही का मामला बन सकता है।
ग्रामीणों ने मांग की है कि जब तक पूरे मामले की तकनीकी और वित्तीय जांच पूरी न हो, तब तक इस कार्य का भुगतान तत्काल रोका जाए। साथ ही मस्टर रोल, जॉब कार्ड, माप पुस्तिका (एमबी) और सामग्री-श्रम अनुपात की जांच की जाए। दोषी पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग भी उठाई गई है।
अब देखना यह है कि प्रशासन इन आरोपों को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या निष्पक्ष जांच के माध्यम से सच्चाई सामने लाई जाएगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा ।




