पंचायत के साए में ही सवालों के घेरे में सीसी रोड निर्माण! 19 दिन में 13.56 लाख खर्च, गुणवत्ता पर उठे गंभीर सवाल
सहसपुर लोहारा। ग्राम पंचायत कुमार दनिया में हुए सीसी रोड निर्माण कार्य पर अब सवालों का साया गहराता जा रहा है। सूचना फलक पर अंकित विवरण के अनुसार वर्ष 2025-26 में “सीसी रोड निर्माण – पंचायत भवन से मनथीर के घर तक” कार्य स्वीकृत हुआ। कुल स्वीकृत राशि 13,56,000 रुपये दर्शाई गई है। कार्य एजेंसी के रूप में सरपंच, ग्राम पंचायत का नाम अंकित है, जबकि तकनीकी सहयोग जनपद पंचायत सहायक स्तर से बताया गया है।
सबसे चौंकाने वाली बात निर्माण अवधि को लेकर सामने आती है। सूचना फलक के अनुसार कार्य प्रारंभ तिथि 20 मई 2025 और पूर्णता तिथि 08 जून 2025 अंकित है। अर्थात मात्र 19 दिनों में 13.56 लाख रुपये की लागत से सीसी रोड निर्माण पूरा कर दिया गया। इतनी कम अवधि में कार्य की गुणवत्ता, मटेरियल की मजबूती, बेस तैयार करने की प्रक्रिया, क्योरिंग (पानी देकर मजबूती बढ़ाने की प्रक्रिया) जैसे तकनीकी पहलुओं पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि पंचायत के समीप ही निर्माण होने के बावजूद गुणवत्ता की निगरानी में लापरवाही बरती गई। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की मोटाई, किनारों की फिनिशिंग और सीमेंट-कंक्रीट के अनुपात को लेकर पारदर्शिता नहीं रखी गई। यदि कार्य पंचायत भवन से ही प्रारंभ होता है, तो जिम्मेदारों की नजर से खामियां कैसे छूट गईं । क्या निर्माण के दौरान तकनीकी अमले ने स्थल निरीक्षण किया। यदि किया, तो निरीक्षण प्रतिवेदन सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया।
सूचना फलक में तकनीकी स्वीकृति क्रमांक और प्रशासकीय स्वीकृति क्रमांक भी दर्ज हैं, जिससे स्पष्ट है कि कार्य पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरा। ऐसे में जिम्मेदारी तय करना और भी आवश्यक हो जाता है। कार्य एजेंसी के रूप में सरपंच का नाम अंकित है, अतः प्रथमदृष्टया जवाबदेही पंचायत प्रतिनिधियों पर बनती है। वहीं तकनीकी सहायक और जनपद पंचायत स्तर के इंजीनियरों की भी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। निर्माण की गुणवत्ता सुनिश्चित करना केवल ठेकेदार या एजेंसी का ही दायित्व नहीं, बल्कि तकनीकी अमले का भी कर्तव्य है।
ग्रामीणों के अनुसार यदि 19 दिनों में कार्य पूर्ण दिखा दिया गया, तो क्या निर्धारित मानकों के अनुसार पर्याप्त क्योरिंग की गई। क्या सड़क की बेस लेयर को पर्याप्त समय दिया गया। क्या सामग्री की जांच हुई ।इन सभी बिंदुओं की स्वतंत्र तकनीकी जांच आवश्यक प्रतीत होती है। पंचायत के समीप हुए कार्य में यदि पारदर्शिता नहीं दिखे, तो दूरस्थ क्षेत्रों में हो रहे निर्माण कार्यों की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
अब बड़ा सवाल यह है कि 13.56 लाख रुपये की राशि का उपयोग पूरी गुणवत्ता और मानकों के अनुरूप हुआ या नहीं? क्या संबंधित अधिकारियों ने माप पुस्तिका (एमबी) का सत्यापन किया। क्या भुगतान से पहले गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट ली गई। यदि नहीं, तो यह सीधे-सीधे वित्तीय अनुशासन और शासन की मंशा पर प्रश्न खड़ा करता है।
जनता की मांग है कि जिला प्रशासन, विशेषकर जिला पंचायत और तकनीकी शाखा, इस कार्य की निष्पक्ष जांच कराए। निर्माण की मोटाई, लंबाई, उपयोग सामग्री और कुल लागत का पुनर्मूल्यांकन हो। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता पाई जाती है तो संबंधित सरपंच, तकनीकी सहायक और स्वीकृति देने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए।
पंचायत के दरवाजे पर बना यह सीसी रोड अब विकास से अधिक सवालों की राह बन गया है। जब निगरानी तंत्र के सामने ही गुणवत्ता पर संदेह खड़ा हो जाए, तो जवाबदेही तय करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी बन जाती है। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेता है या यह मामला भी अन्य निर्माण कार्यों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।




